देवशयनी एकादशी व्रत कथा · Devshayani Ekadashi Vrat Katha

राजा मान्धाता की कथा, जिनका राज्य तीन वर्ष के अकाल से देवशयनी (पद्मा) एकादशी के व्रत से बचा, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।

कथा (हमारे शब्दों में)

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा, जिसे पद्मा एकादशी भी कहते हैं। श्रीकृष्ण ने उन्हें वह कथा सुनाई जो ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाई थी।

राजा मान्धाता धर्म से राज्य करते थे, और उनकी प्रजा हर प्रकार से सुखी थी। पर तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई, और राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। लोग अन्न के लिए त्राहि-त्राहि करने लगे, और राजा दुखी होकर सोचने लगे कि किस दोष के कारण उनके राज्य पर यह संकट आया।

राजा ऋषि अंगिरा के पास गए और अकाल दूर करने का उपाय पूछा। ऋषि ने उन्हें आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने, और प्रजा से भी करवाने को कहा।

मान्धाता ने प्रजा के साथ देवशयनी एकादशी का व्रत किया। उसके प्रभाव से मूसलधार वर्षा हुई, धरती फिर हरी हो गई, और राज्य धन-धान्य से भर गया।

कथा कहती है कि यह व्रत करने वालों की मनोकामनाएँ पूरी करता है।

यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।

इस पाठ के बारे में

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसकी कथा उस शृंखला का भाग है जिसमें हर एकादशी की महिमा बताई जाती है, प्रायः श्रीकृष्ण के पांडवों को दिए उत्तर के रूप में। मान्यता है कि इस दिन विष्णु भगवान चार महीने के लिए योगनिद्रा में जाते हैं, और चातुर्मास आरंभ होता है, जो कार्तिक की प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी को समाप्त होता है।

प्रकाशित रूप हिंदी गद्य में हैं और उनके शब्दों तथा कुछ नामों और विवरणों में अंतर है। ऊपर दी गई कथा में केवल वही बातें हैं जिन पर नीचे दिए गए कम से कम दो रूप सहमत हैं। इस वर्ष की तिथि के लिए देवशयनी एकादशी देखें।

पाठ कैसे किया जाता है

कथा देवशयनी एकादशी के दिन विष्णु भगवान की पूजा के अंग के रूप में पढ़ी या सुनी जाती है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।

कब पढ़ा जाता है

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स्रोत और जाँच

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