अपरा एकादशी व्रत कथा · Apara Ekadashi Vrat Katha
अपरा (अचला) एकादशी को अपार पुण्य देने वाली क्यों कहा जाता है, और राजा महीध्वज की कथा, जो इसके पुण्य से प्रेत-योनि से मुक्त हुए, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।
कथा (हमारे शब्दों में)
युधिष्ठिर के ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछने पर श्रीकृष्ण ने कहा कि इसे अपरा, और अचला भी, कहते हैं, क्योंकि यह अपार पुण्य देती है और इसे करने वाले संसार में प्रसिद्ध होते हैं।
उन्होंने कहा कि इसका व्रत बड़े-बड़े पापों को भी दूर करता है: ब्रह्महत्या, निंदा, झूठी गवाही और झूठ बोलना, झूठे शास्त्र, झूठा ज्योतिषी या वैद्य बनना। युद्ध से भागने वाला क्षत्रिय, और गुरु से विद्या लेकर उनकी निंदा करने वाला शिष्य नरक में जाते हैं, पर यह व्रत करने से वे भी मुक्त हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इसका फल सबसे पवित्र अवसरों पर तीर्थ-स्नान और बड़े-बड़े दानों के बराबर है, और यह पापों को वैसे नष्ट करता है जैसे सूर्य अंधकार को।
इस एकादशी की कथा राजा महीध्वज की है, जो धर्मात्मा राजा थे, पर उनका छोटा भाई वज्रध्वज उनसे द्वेष रखता था। एक रात वज्रध्वज ने उनकी हत्या करके शव को चुपचाप एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु और संस्कार न होने के कारण राजा आगे की गति न पा सके, और बेचैन प्रेत बनकर उसी पीपल पर रहने लगे, जिससे आसपास सबको कष्ट होने लगा।
उसी रास्ते से गुज़रते धौम्य ऋषि ने अपनी अंतर्दृष्टि से जान लिया कि क्या हुआ था। करुणा करके उन्होंने अपरा एकादशी के व्रत का पुण्य उस प्रेत को अर्पित करवाया, ताकि वह मुक्त हो सके। उस पुण्य से राजा प्रेत-योनि से छूटकर दिव्य रूप में स्वर्ग गए।
कथा के अंत में कहा गया है कि जो यह कथा पढ़ता या सुनता है, वह पापों से छूट जाता है।
यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।
इस पाठ के बारे में
अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है (पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार; अमांत पंचांग में यह वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आती है)। इसकी कथा उस शृंखला का भाग है जिसमें हर एकादशी की महिमा बताई जाती है, प्रायः श्रीकृष्ण के पांडवों को दिए उत्तर के रूप में।
प्रकाशित रूप हिंदी गद्य में हैं और उनके शब्दों तथा कुछ नामों और विवरणों में अंतर है। ऊपर दी गई कथा में केवल वही बातें हैं जिन पर नीचे दिए गए कम से कम दो रूप सहमत हैं। इस वर्ष की तिथि के लिए एकादशी देखें।
पाठ कैसे किया जाता है
कथा अपरा एकादशी के दिन विष्णु भगवान की पूजा के अंग के रूप में पढ़ी या सुनी जाती है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।
और पढ़ें: विष्णु
और व्रत कथाएँ
स्रोत और जाँच
- तुलना किए गए संस्करण
- कथा के स्रोत
- अपरा एकादशी व्रत कथा, Bhakti Bharat
- अपरा एकादशी व्रत कथा, Shubh Panchang
- अपरा एकादशी: व्रत और उसकी कथा, PanchangBodh
- पाठ की जाँच
- सनातनशाला संपादकीय प्रक्रिया
- अंतिम जाँच
परिवर्तन सूची
- : प्रकाशित। इस पृष्ठ पर दिए गए प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में लिखी कथा (संपादकीय नीति देखें)।