देवउठनी एकादशी व्रत कथा · Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha
उस एकादशी की महिमा जिस दिन विष्णु भगवान जागते हैं, और एक भूखे सेवक की कथा, जिसके साथ भगवान भोजन करने आए, और जिससे एक राजा ने सीखा कि व्रत के लिए शुद्ध मन चाहिए, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।
कथा (हमारे शब्दों में)
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी वह दिन है जब विष्णु भगवान चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। कहा जाता है कि इसका व्रत बड़े पापों का नाश करता है; इसकी रात भगवान के भजन और कथा के साथ जागरण करने से बड़े से बड़े पाप भी मिट जाते हैं। चातुर्मास में छोड़ी गई वस्तुएँ इस दिन से फिर ली जा सकती हैं।
इस एकादशी की कथा एक राजा की है, जिसके राज्य में सब एकादशी का व्रत रखते थे, और उस दिन किसी को, सेवकों को भी, अन्न नहीं दिया जाता था। दूसरे राज्य का एक व्यक्ति नौकरी माँगने आया, और राजा ने इस शर्त पर रख लिया कि एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा। उसने हाँ कर दी। पर एकादशी आने पर जब उसे केवल फलाहार मिला, तो वह राजा से अन्न माँगने लगा कि वह भूखा मर जाएगा। अंत में राजा ने उसे आटा, दाल और चावल दे दिए।
वह नदी पर गया, स्नान किया, भोजन बनाया और पुकारा, "आओ भगवान, भोजन तैयार है।" विष्णु भगवान चतुर्भुज रूप में आए और प्रेम से उसके साथ भोजन किया, फिर अंतर्धान हो गए।
अगली एकादशी को उसने दुगुना सामान माँगा, क्योंकि भगवान उसके साथ खाते हैं और दोनों के लिए पूरा नहीं पड़ा था। राजा को विश्वास न हुआ: वे इतना व्रत और पूजा करते हैं, फिर भी भगवान ने उन्हें कभी दर्शन नहीं दिए। इसलिए वे पेड़ के पीछे छिपकर देखने लगे। इस बार वह व्यक्ति भोजन बनाकर शाम तक पुकारता रहा, पर भगवान नहीं आए। अंत में उसने कहा कि यदि भगवान नहीं आए तो वह नदी में कूदकर प्राण दे देगा, और वह नदी की ओर बढ़ा। तुरंत विष्णु भगवान प्रकट हुए, उसे रोका और साथ बैठकर भोजन किया, फिर उसे अपने धाम ले गए।
यह देखकर राजा समझ गए कि मन शुद्ध न हो तो व्रत-उपवास का कोई फल नहीं। तब से वे सच्चे मन से व्रत करने लगे, और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए।
यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।
इस पाठ के बारे में
देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसकी कथा उस शृंखला का भाग है जिसमें हर एकादशी की महिमा बताई जाती है, प्रायः श्रीकृष्ण के पांडवों को दिए उत्तर के रूप में। इसे प्रबोधिनी (जगाने वाली) और देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन विष्णु भगवान चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, चातुर्मास समाप्त होता है, और अनेक घरों में तुलसी विवाह होता है।
प्रकाशित रूप हिंदी गद्य में हैं और उनके शब्दों तथा कुछ नामों और विवरणों में अंतर है। ऊपर दी गई कथा में केवल वही बातें हैं जिन पर नीचे दिए गए कम से कम दो रूप सहमत हैं। इस वर्ष की तिथि के लिए देवउठनी एकादशी देखें।
पाठ कैसे किया जाता है
कथा देवउठनी एकादशी के दिन विष्णु भगवान की पूजा के अंग के रूप में पढ़ी या सुनी जाती है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।
कब पढ़ा जाता है
- देव उठनी एकादशी · शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
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और व्रत कथाएँ
स्रोत और जाँच
- तुलना किए गए संस्करण
- कथा के स्रोत
- देवउठनी एकादशी व्रत कथा, Bhakti Bharat
- देवउठनी एकादशी व्रत कथा, Shubh Panchang
- देवउठनी एकादशी की व्रत कथा, Navbharat Live
- देव उठनी एकादशी, PanchangBodh
- पाठ की जाँच
- सनातनशाला संपादकीय प्रक्रिया
- अंतिम जाँच
परिवर्तन सूची
- : प्रकाशित। इस पृष्ठ पर दिए गए प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में लिखी कथा (संपादकीय नीति देखें)।