बृहस्पतिवार व्रत कथा · Brihaspativar Vrat Katha
बृहस्पति देव की गुरुवार व्रत कथा: एक रानी जिसने अपने धन के नष्ट होने की इच्छा की, फिर आई दरिद्रता, और गुरुवार के व्रत से समृद्धि कैसे लौटी, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।
कथा (हमारे शब्दों में)
एक प्रतापी और दानी राजा था, जो गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता और खुलकर दान देता था। उसकी रानी को यह अच्छा नहीं लगता था: वह न स्वयं दान देती, न व्रत करती, और राजा को भी दान देने से रोकती थी।
एक दिन जब राजा शिकार पर गए थे, बृहस्पति देव साधु के वेश में महल आए और भिक्षा माँगी। रानी ने मना कर दिया और कहा कि वह इस दान-पुण्य से तंग आ गई है; वह चाहती है कि उनका धन नष्ट हो जाए। साधु को आश्चर्य हुआ: धन और संतान तो सभी चाहते हैं, उन्होंने कहा, और यदि धन अधिक है तो भूखों को भोजन कराने और गरीब कन्याओं के विवाह जैसे शुभ कार्यों में लगाओ। पर रानी नहीं मानी। तब साधु ने कहा कि यदि यही इच्छा है, तो बृहस्पतिवार को वे काम करो जिनसे धन जाता है, जैसे घर लीपना और पीली मिट्टी से सिर धोना। फिर वे अंतर्धान हो गए।
रानी ने वैसा ही किया, और केवल तीन बृहस्पतिवार में सारा धन नष्ट हो गया और घर में खाने को कुछ न रहा। जहाँ सब उन्हें जानते थे वहाँ छोटा काम न कर पाने के कारण राजा परदेश चले गए, और लकड़ी काटकर बेचने लगे। रानी और दासी दुख में रह गईं।
एक बार सात दिन बिना भोजन के रहने के बाद रानी ने दासी को पास के नगर में अपनी धनी बहन के पास भेजा। उस दिन गुरुवार था और बहन बृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी, इसलिए उसने उत्तर नहीं दिया, और दासी दुखी और क्रोधित होकर लौट आई। कथा के बाद बहन स्वयं आई और बताया कि कथा के समय न उठते हैं, न बोलते हैं। उनकी भूख की बात सुनकर उसने कहा कि बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं, और घर में देखने को कहा; दासी ने अंदर जाकर अनाज से भरा घड़ा पाया।
तब रानी ने बहन से व्रत की विधि पूछी। उसने बताया: केले की जड़ में चने की दाल और मुनक्के से विष्णु भगवान की पूजा करो, दीपक जलाओ, कथा सुनो, और केवल पीला भोजन करो। अगले गुरुवार रानी और दासी ने व्रत रखा। प्रसन्न होकर बृहस्पति देव एक साधारण व्यक्ति के रूप में आए और उन्हें पीले भोजन के थाल दे गए। तब से वे हर गुरुवार व्रत करने लगीं, और बृहस्पति देव की कृपा से धन लौट आया।
जब रानी फिर लापरवाह होने लगी, तो दासी ने उसे याद दिलाया कि धन कैसे गया था, और दान करने और शुभ कार्यों में धन लगाने को कहा। रानी ने वैसा किया, और पूरे नगर में उसका यश फैल गया।
यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।
इस पाठ के बारे में
यह गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत में पढ़ी जाने वाली कथा है, जो बृहस्पति देव और विष्णु भगवान के लिए रखा जाता है। प्रकाशित रूप एक ही प्रचलित पाठ पर आधारित हैं, थोड़े अंतर के साथ; कुछ में लकड़हारा बने राजा की कथा का दूसरा भाग भी है। ऊपर दी गई कथा में वह भाग है जो नीचे दिए गए रूपों में समान है।
पाठ कैसे किया जाता है
कथा गुरुवार को व्रत के अंग के रूप में पढ़ी या सुनी जाती है, जिसके बाद आरती और प्रसाद होता है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।
कब पढ़ा जाता है
और पढ़ें: विष्णु
और व्रत कथाएँ
स्रोत और जाँच
- तुलना किए गए संस्करण
- कथा के स्रोत
- बृहस्पतिवार व्रत कथा, Bhakti Bharat
- गुरुवार व्रत कथा, Shubh Panchang
- बृहस्पतिवार व्रत कथा, Astrobix
- पाठ की जाँच
- सनातनशाला संपादकीय प्रक्रिया
- अंतिम जाँच
परिवर्तन सूची
- : प्रकाशित। इस पृष्ठ पर दिए गए प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में लिखी कथा (संपादकीय नीति देखें)।