सत्यनारायण व्रत कथा · Satyanarayan Vrat Katha

सत्यनारायण व्रत कथा के पाँचों अध्याय सरल शब्दों में, और उसके बाद स्वतंत्र संस्करणों से मिलाया गया संस्कृत पाठ, हर श्लोक के अर्थ के साथ।

कथा (हमारे शब्दों में)

पहला अध्याय

नैमिषारण्य में ऋषि सूत जी से पूछते हैं कि किस व्रत से मनचाहा फल मिलता है। सूत जी बताते हैं कि भगवान विष्णु ने यह नारद जी से कहा था। नारद जी ने पृथ्वी के लोगों को दुखी देखा, तो विष्णु भगवान के पास जाकर उनके दुख दूर करने का कोई सरल उपाय पूछा। भगवान ने सत्यनारायण का व्रत बताया: किसी भी दिन, शाम को, ब्राह्मणों और बंधुओं के साथ भक्ति से उनकी पूजा करें; केला, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया मात्रा में अर्पित करें (ये न हों तो चावल का आटा और शक्कर या गुड़); कथा सुनें; ब्राह्मण को दक्षिणा दें; प्रसाद ग्रहण करें; और सत्यनारायण का स्मरण करते हुए घर जाएँ। उन्होंने कहा कि कलियुग में मनोकामना पूरी करने का यही सरल उपाय है।

दूसरा अध्याय

काशी में एक बहुत गरीब ब्राह्मण रोज़ भिक्षा माँगता फिरता था। भगवान बूढ़े ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए और उसे व्रत बताया। अगले दिन उसे बहुत धन मिला, उसने बंधुओं के साथ व्रत किया और दुखों से छूट गया; फिर वह हर महीने व्रत करने लगा। पूजा के समय प्यासा एक लकड़हारा उसके घर आया, व्रत के बारे में जाना, और निश्चय किया कि उस दिन लकड़ी बेचकर जो मिलेगा उसी से व्रत करेगा। उसे लकड़ी का दुगुना दाम मिला और उसने परिवार के साथ व्रत किया। वह इस जीवन में धन और पुत्रों से युक्त हुआ और अंत में सत्यपुर गया।

तीसरा अध्याय

राजा उल्कामुख और उनकी रानी भद्रशीला नदी के किनारे व्रत कर रहे थे, तभी साधु नाम का एक वणिक नाव से वहाँ आया। यह सुनकर कि व्रत से संतान मिलती है, उसने संकल्प किया कि संतान होने पर व्रत करेगा। उसकी पत्नी लीलावती से कलावती नाम की कन्या हुई, पर उसने व्रत विवाह तक टाल दिया, और फिर भूल गया। सत्यनारायण रुष्ट हो गए। जब साधु और उसका दामाद राजा चंद्रकेतु के नगर में व्यापार कर रहे थे, राजा का धन चुराने वाला एक चोर वह धन उनके पास छोड़ गया; दोनों चोर समझे गए, उनका धन ले लिया गया और उन्हें कारागार में डाल दिया गया। घर पर लीलावती और कलावती के यहाँ भी चोरी हो गई और वे गरीबी में पड़ गईं। कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण का व्रत होते देखा और माँ को बताया, और लीलावती ने पति और दामाद के लिए प्रार्थना करते हुए व्रत किया। तब सत्यनारायण ने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न दिया, और राजा ने वणिकों को छोड़ दिया, उनका सम्मान किया और लिया हुआ धन दुगुना करके लौटाया।

चौथा अध्याय

घर लौटते समय सत्यनारायण ने संन्यासी (दंडी) के रूप में पूछा कि नाव में क्या है। वणिकों ने हँसी उड़ाई: "केवल लताएँ और पत्ते"। दंडी ने कहा, "तुम्हारा वचन सत्य हो", और धन लता-पत्तों में बदल गया। दामाद की सलाह पर साधु दंडी के पास गया, क्षमा माँगी और स्तुति की, और धन लौट आया। नगर के पास पहुँचने का समाचार पाकर लीलावती पूजा पूरी करके उनसे मिलने चली; कलावती प्रसाद छोड़कर उसके पीछे दौड़ी। दामाद नाव सहित जल में ओझल हो गया। आकाशवाणी हुई कि प्रसाद छोड़ने के कारण ऐसा हुआ; कलावती ने घर जाकर प्रसाद खाया, लौटी और उसे पति मिल गया। परिवार घर गया, और साधु हर पूर्णिमा और संक्रांति को व्रत करने लगा।

पाँचवाँ अध्याय

राजा तुंगध्वज शिकार से लौटते हुए बरगद के नीचे ग्वालों को सत्यनारायण की पूजा करते देखता है। घमंड में वह न उनके साथ बैठा, न प्रणाम किया, और उनके रखे प्रसाद को भी छोड़ दिया। उसके सौ पुत्र और धन नष्ट हो गए। वह लौटा, ग्वालों के साथ श्रद्धा से व्रत किया, और उसे पुत्र और धन फिर मिल गए। कथा के अंत में कहा गया है कि जो यह व्रत करता है, या भक्ति से यह कथा पढ़ता या सुनता है, वह दरिद्रता, बंधन और भय से छूट जाता है, और कलियुग में विष्णु भगवान इसी व्रत का रूप लेते हैं।

यह कथा हमने अपने शब्दों में लिखी है; इसकी हर बात कम से कम दो स्रोतों में मिलती है (नीचे सूचीबद्ध)। मूल पाठ इसके नीचे है।

मूल पाठ

भाग 1 / 5: पहला अध्याय: नारद जी को व्रत का उपदेश

  1. एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः । पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ॥

    ekadā naimiṣāraṇye ṛṣayaḥ śaunakādayaḥ । papracchurmunayaḥ sarve sūtaṃ paurāṇikaṃ khalu ॥

    एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि सभी ऋषियों ने पुराणों के वक्ता सूत जी से पूछा:

    Once, in the Naimisha forest, the sages led by Shaunaka all asked Suta, the teller of the Puranas:

  2. ऋषय ऊचुः । व्रतेन तपसा किं वा प्राप्यते वाञ्छितं फलम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामः कथयस्व महामुने ॥

    ṛṣaya ūcuḥ । vratena tapasā kiṃ vā prāpyate vāñchitaṃ phalam । tatsarvaṃ śrotumicchāmaḥ kathayasva mahāmune ॥

    ऋषि बोले: 'किस व्रत या तप से मनचाहा फल मिलता है? हम वह सब सुनना चाहते हैं; हे महामुनि, हमें बताइए।'

    The sages said: 'By what vow or austerity is the desired fruit obtained? We wish to hear all of it; tell us, great sage.'

  3. सूत उवाच । नारदेनैव सम्पृष्टो भगवान् कमलापतिः । सुरर्षये यथैवाह तच्छृणुध्वं समाहिताः ॥

    sūta uvāca । nāradenaiva sampṛṣṭo bhagavān kamalāpatiḥ । surarṣaye yathaivāha tacchṛṇudhvaṃ samāhitāḥ ॥

    सूत जी बोले: 'नारद जी के पूछने पर लक्ष्मीपति भगवान ने स्वयं देवर्षि से जो कहा था, उसे ध्यान से सुनो।

    Suta said: 'Hear attentively what the Lord, husband of Lakshmi, himself told the divine sage Narada when Narada asked him.

  4. एकदा नारदो योगी परानुग्रहकाङ्क्षया । पर्यटन् विविधान् लोकान् मर्त्यलोकमुपागतः ॥

    ekadā nārado yogī parānugrahakāṅkṣayā । paryaṭan vividhān lokān martyalokamupāgataḥ ॥

    एक बार योगी नारद जी दूसरों पर अनुग्रह करने की इच्छा से अनेक लोकों में विचरते हुए मृत्युलोक में आए।

    Once the yogi Narada, wishing to help others, wandered through many worlds and came to the world of mortals.

  5. ततो दृष्ट्वा जनान्सर्वान् नानाक्लेशसमन्वितान् । नाना योनिसमुत्पन्नान् क्लिश्यमानान् स्वकर्मभिः ॥

    tato dṛṣṭvā janānsarvān nānākleśasamanvitān । nānā yonisamutpannān kliśyamānān svakarmabhiḥ ॥

    वहाँ उन्होंने देखा कि सब लोग अनेक कष्टों से घिरे हैं, नाना योनियों में जन्मे हैं और अपने कर्मों से दुख पा रहे हैं।

    There he saw all the people beset by many troubles, born in many kinds of bodies and suffering through their own deeds.

  6. केनोपायेन चैतेषां दुःखनाशो भवेद् ध्रुवम् । इति सञ्चिन्त्य मनसा विष्णुलोकं गतस्तदा ॥

    kenopāyena caiteṣāṃ duḥkhanāśo bhaved dhruvam । iti sañcintya manasā viṣṇulokaṃ gatastadā ॥

    'किस उपाय से इनका दुख निश्चित रूप से दूर हो?' यह मन में सोचकर वे विष्णुलोक गए।

    Thinking 'By what means can their suffering surely be ended?', he went to the world of Vishnu.

  7. तत्र नारायणं देवं शुक्लवर्णं चतुर्भुजम् । शङ्ख-चक्रगदा-पद्म-वन मालाविभूषितम् ॥

    tatra nārāyaṇaṃ devaṃ śuklavarṇaṃ caturbhujam । śaṅkha-cakragadā-padma-vana mālāvibhūṣitam ॥

    वहाँ उन्होंने श्वेत वर्ण, चतुर्भुज, शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमाला से सुशोभित भगवान नारायण के दर्शन किए।

    There he saw Lord Narayana, white in colour and four-armed, adorned with the conch, discus, mace, lotus and the garland of forest flowers.

  8. दृष्ट्वा तं देवदेवेशं स्तोतुं समुपचक्रमे । नारद उवाच । नमो वाङ्गमनसातीतरूपायानन्तशक्तये । आदिमध्यांतहीनाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥

    dṛṣṭvā taṃ devadeveśaṃ stotuṃ samupacakrame । nārada uvāca । namo vāṅgamanasātītarūpāyānantaśaktaye । ādimadhyāṃtahīnāya nirguṇāya guṇātmane ॥

    देवों के देव को देखकर वे स्तुति करने लगे। नारद जी बोले: 'जिनका रूप वाणी और मन से परे है, जिनकी शक्ति अनंत है, जो आदि, मध्य और अंत से रहित हैं, निर्गुण होते हुए भी गुणों के आत्मा हैं, उन्हें नमस्कार है,

    Seeing the Lord of the gods, he began to praise him. Narada said: 'Salutations to you whose form is beyond speech and mind, whose power is endless, who has no beginning, middle or end, who is beyond qualities yet the soul of all qualities,

  9. सर्वेषामादिभूताय भक्तानामार्तिनाशिने । श्रुत्वा स्तोत्रं ततो विष्णुर्नारदं प्रत्यभाषत ॥

    sarveṣāmādibhūtāya bhaktānāmārtināśine । śrutvā stotraṃ tato viṣṇurnāradaṃ pratyabhāṣata ॥

    जो सबके आदि हैं और भक्तों के कष्ट दूर करते हैं।' यह स्तुति सुनकर विष्णु भगवान नारद जी से बोले।

    the origin of all, who removes the distress of devotees.' Hearing this hymn, Vishnu then spoke to Narada.

  10. श्रीभगवानुवाच । किमर्थमागतोऽसि त्वं किं ते मनसि वर्तते । कथयस्व महाभाग तत्सर्वं कथयामि ते ॥

    śrībhagavānuvāca । kimarthamāgato'si tvaṃ kiṃ te manasi vartate । kathayasva mahābhāga tatsarvaṃ kathayāmi te ॥

    भगवान बोले: 'तुम किसलिए आए हो? तुम्हारे मन में क्या है? हे महाभाग, कहो; मैं तुम्हें सब बताऊँगा।'

    The Lord said: 'Why have you come? What is in your mind? Tell me, fortunate one; I will tell you everything.'

  11. नारद उवाच । मर्त्यलोके जनाः सर्वे नानाक्लेशसमन्विताः । नानायोनिसमुत्पन्नाः पच्यन्ते पापकर्मभिः ॥

    nārada uvāca । martyaloke janāḥ sarve nānākleśasamanvitāḥ । nānāyonisamutpannāḥ pacyante pāpakarmabhiḥ ॥

    नारद जी बोले: 'मृत्युलोक में सब लोग अनेक कष्टों से घिरे हैं; नाना योनियों में जन्म लेकर वे अपने पाप कर्मों से पीड़ित हो रहे हैं।

    Narada said: 'In the world of mortals all people are beset by troubles; born in many kinds of bodies, they are tormented by their sinful deeds.

  12. तत्कथं शमयेन्नाथ लघूपायेन तद् वद । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं कृपास्ति यदि ते मयि ॥

    tatkathaṃ śamayennātha laghūpāyena tad vada । śrotumicchāmi tatsarvaṃ kṛpāsti yadi te mayi ॥

    हे नाथ, किस सरल उपाय से वह शांत हो, बताइए; यदि मुझ पर आपकी कृपा है तो मैं वह सब सुनना चाहता हूँ।'

    How can that be eased, Lord, by some simple means? Tell me; I wish to hear all of it, if you have grace for me.'

  13. श्रीभगवानुवाच । साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकाङ्क्षया । यत्कृत्वा मुच्यते मोहात् तच्छृणुष्व वदामि ते ॥

    śrībhagavānuvāca । sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vatsa lokānugrahakāṅkṣayā । yatkṛtvā mucyate mohāt tacchṛṇuṣva vadāmi te ॥

    भगवान बोले: 'हे वत्स, लोकों पर अनुग्रह की इच्छा से तुमने अच्छा प्रश्न किया। जिसे करके मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह सुनो, मैं बताता हूँ।

    The Lord said: 'Well asked, my child, out of a wish to help the world. Hear what I tell you, by doing which one is freed from delusion.

  14. व्रतमस्ति महत्पुण्यं स्वर्गे मर्त्ये च दुर्लभम् । तव स्नेहान्मया वत्स प्रकाशः क्रियतेऽधुना ॥

    vratamasti mahatpuṇyaṃ svarge martye ca durlabham । tava snehānmayā vatsa prakāśaḥ kriyate'dhunā ॥

    एक अत्यंत पुण्यदायक व्रत है, जो स्वर्ग और मृत्युलोक दोनों में दुर्लभ है; हे वत्स, तुम्हारे स्नेह के कारण मैं अब उसे प्रकट करता हूँ।

    There is a vow of great merit, rare in heaven and on earth; out of affection for you, my child, I now make it known.

  15. सत्यनारायणस्यैवं व्रतं सम्यग्विधानतः । कृत्वा सद्यःसुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात् । तच्छुत्वा भगवद्वाक्यं नारदो मुनिरब्रवीत् ॥

    satyanārāyaṇasyaivaṃ vrataṃ samyagvidhānataḥ । kṛtvā sadyaḥsukhaṃ bhuktvā paratra mokṣamāpnuyāt । tacchutvā bhagavadvākyaṃ nārado munirabravīt ॥

    सत्यनारायण का यह व्रत विधिपूर्वक करके मनुष्य तुरंत सुख भोगता है और परलोक में मोक्ष पाता है।' भगवान के वचन सुनकर नारद मुनि बोले:

    By duly keeping this vow of Satyanarayana one enjoys happiness at once and attains liberation hereafter.' Hearing the Lord's words, the sage Narada said:

  16. नारद उवाच । किं फलं किं विधानं च कृतं केनैव तद्व्रतम् । तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं व्रतं प्रभो ॥

    nārada uvāca । kiṃ phalaṃ kiṃ vidhānaṃ ca kṛtaṃ kenaiva tadvratam । tatsarvaṃ vistarād brūhi kadā kāryaṃ vrataṃ prabho ॥

    नारद जी बोले: 'इसका फल क्या है, इसकी विधि क्या है, और यह व्रत किसने किया? हे प्रभो, यह सब विस्तार से बताइए, और यह कब करना चाहिए।'

    Narada said: 'What is its fruit, what is its procedure, and who has kept this vow? Tell me all of it in detail, and when it should be kept, Lord.'

    संस्करणों में अंतर: «तत्सर्वं विस्तराद् बूरहि कदा कार्यं व्रतं हि तत्» (vedicvidha, vani4u); «तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं व्रतं प्रभो» (sanskritdocuments); «तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं व्रतं हि तत्» (mnsgranth); «तत्सर्वं विस्तराद्ब्रुहि कदा कार्यं हि तद्व्रतम्» (hindunidhi).

  17. श्रीभगवानुवाच । दुःख-शोकादिशमनं धन-धान्यप्रवर्धनम् ॥

    śrībhagavānuvāca । duḥkha-śokādiśamanaṃ dhana-dhānyapravardhanam ॥

    भगवान बोले: 'यह दुख और शोक आदि को शांत करने वाला और धन-धान्य को बढ़ाने वाला है;

    The Lord said: 'It removes sorrow and grief and increases wealth and grain;

  18. सौभाग्यसन्ततिकरं सर्वत्र विजयप्रदम् । यस्मिन् कस्मिन् दिने मर्त्यो भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥

    saubhāgyasantatikaraṃ sarvatra vijayapradam । yasmin kasmin dine martyo bhaktiśraddhāsamanvitaḥ ॥

    सौभाग्य और संतान देने वाला और सर्वत्र विजय देने वाला है। किसी भी दिन, भक्ति और श्रद्धा से युक्त मनुष्य

    it brings good fortune and children and gives success everywhere. On any day, a person filled with devotion and faith

  19. सत्यनारायणं देवं यजेच्चैव निशामुखे । ब्राह्मणैर्बान्धवैश्चैव सहितो धर्मतत्परः ॥

    satyanārāyaṇaṃ devaṃ yajeccaiva niśāmukhe । brāhmaṇairbāndhavaiścaiva sahito dharmatatparaḥ ॥

    संध्या के समय ब्राह्मणों और बंधुओं के साथ, धर्म में तत्पर होकर, भगवान सत्यनारायण की पूजा करे।

    should worship Lord Satyanarayana at nightfall, together with brahmins and relatives, devoted to dharma.

  20. नैवेद्यं भक्तितो दद्यात् सपादं भक्ष्यमुत्तमम् । रम्भाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णकम् ॥

    naivedyaṃ bhaktito dadyāt sapādaṃ bhakṣyamuttamam । rambhāphalaṃ ghṛtaṃ kṣīraṃ godhūmasya ca cūrṇakam ॥

    भक्ति से सवाया उत्तम नैवेद्य अर्पित करे: केला, घी, दूध और गेहूँ का आटा;

    With devotion he should offer food, one and a quarter measures of the finest: banana, ghee, milk and wheat flour;

  21. अभावे शालिचूर्णं वा शर्करा वा गुडस्तथा । सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्य निवेदयेत् ॥

    abhāve śālicūrṇaṃ vā śarkarā vā guḍastathā । sapādaṃ sarvabhakṣyāṇi caikīkṛtya nivedayet ॥

    इनके अभाव में चावल का आटा, या शक्कर या गुड़; सब भोज्य पदार्थ सवाये मात्रा में मिलाकर अर्पित करे।

    in their absence, rice flour, or sugar or jaggery; he should combine all the foods, one and a quarter measures, and offer them.

  22. विप्राय दक्षिणां दद्यात् कथां श्रुत्वा जनैः सह । ततश्च बन्धुभिः सार्धं विप्रांश्च प्रतिभोजयेत् ॥

    viprāya dakṣiṇāṃ dadyāt kathāṃ śrutvā janaiḥ saha । tataśca bandhubhiḥ sārdhaṃ viprāṃśca pratibhojayet ॥

    लोगों के साथ कथा सुनकर ब्राह्मण को दक्षिणा दे, और फिर बंधुओं के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराए।

    After hearing the story with others, he should give the brahmin his fee, and then, with his relatives, feed the brahmins.

  23. प्रसादं भक्षयेद् भक्त्यानृत्यगीतादिकं चरेत् । ततश्च स्वगृहं गच्छेत् सत्यनारायणं स्मरन् ॥

    prasādaṃ bhakṣayed bhaktyānṛtyagītādikaṃ caret । tataśca svagṛhaṃ gacchet satyanārāyaṇaṃ smaran ॥

    भक्ति से प्रसाद ग्रहण करे और नृत्य-गीत आदि करे; फिर सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाए।

    He should eat the prasad with devotion and have dancing and singing; then he should go home remembering Satyanarayana.

  24. एवं कृते मनुष्याणां वाञ्छासिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । विशेषतः कलियुगे लघूपायोऽस्ति भूतले ॥

    evaṃ kṛte manuṣyāṇāṃ vāñchāsiddhirbhaved dhruvam । viśeṣataḥ kaliyuge laghūpāyo'sti bhūtale ॥

    ऐसा करने से मनुष्यों की मनोकामना निश्चित रूप से पूरी होती है; विशेषकर कलियुग में पृथ्वी पर यही सरल उपाय है।'

    When this is done, people's wishes are surely fulfilled; especially in the Kali age, this is the simple means on earth.'

इस पाठ के बारे में

सत्यनारायण व्रत कथा वह कथा है जो सत्यनारायण पूजा में पढ़ी जाती है, जिसमें विष्णु भगवान की "सत्य-स्वरूप नारायण" के रूप में पूजा होती है। इसके पाँच अध्याय हैं: विष्णु भगवान का नारद जी को व्रत बताना; गरीब ब्राह्मण और लकड़हारा; साधु वणिक, जो अपना संकल्प भूल जाता है; उसकी घर-वापसी और उसकी बेटी कलावती, जो प्रसाद छोड़ देती है; और राजा तुंगध्वज, जो ग्वालों के प्रसाद का अनादर करता है। हर कथा में भगवान से किया गया संकल्प निभाने या तोड़ने, और प्रसाद के आदर या अनादर का फल दिखाया गया है।

छपे संस्करणों में हर अध्याय के अंत की पुष्पिका इस कथा को स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड का अंश बताती है। विद्वान यह व्रत भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व में भी पाते हैं, और बताते हैं कि जिस रेवा खण्ड में यह है वह स्कन्द पुराण के कुछ ही छपे संस्करणों में मिलता है।

नीचे दिया गया संस्कृत पाठ स्वतंत्र ऑनलाइन संस्करणों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है (स्रोत देखें)। हर पंक्ति तभी दिखाई गई है जब कम से कम दो स्वतंत्र संस्करण सहमत हों, केवल तीन अपवाद हैं: तीन पंक्तियों में सभी संस्करणों के शब्द थोड़े अलग हैं, इसलिए वहाँ हर संस्करण का पाठ दिखाया गया है। अध्यायों की पुष्पिकाएँ नहीं दिखाई गई हैं। कुछ संस्करण अंतिम श्लोक के बाद कथा के पात्रों के अगले जन्मों के श्लोक जोड़ते हैं; वे यहाँ शामिल नहीं हैं।

पाठ कैसे किया जाता है

कथा के अनुसार यह व्रत किसी भी दिन शाम को किया जा सकता है, और कथा का वणिक इसे पूर्णिमा और संक्रांति को करता है; आजकल यह प्रायः पूर्णिमा, गृह-प्रवेश और अन्य शुभ अवसरों पर सत्यनारायण पूजा के अंत में पढ़ी जाती है, जिसके बाद आरती और प्रसाद होता है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।

और पढ़ें: विष्णु

और व्रत कथाएँ

स्रोत और जाँच

तुलना किए गए संस्करण
  • Satyanarayana Vrata Katha (Sanskrit text), sanskritdocuments.org (2026), collated 2026-10-11, sha256 fdc71856513c
  • Satyanarayan Vrat Katha (Sanskrit), vedicvidha.blogspot.com (2026), collated 2026-10-11, sha256 ca875eb5c1ca
  • Satyanarayan Vrat Katha, sankracharyevadwatmandal4u.blogspot.com (2026), collated 2026-10-11, sha256 307f7deab83f
  • Satyanarayan Vrat Katha, mnsgranth.com (2026), collated 2026-10-11, sha256 4c3bf15bf8be
  • Satyanarayan Vrat Katha, hindunidhi.com (2026), collated 2026-10-11, sha256 8388e2a1a970
कथा के स्रोत
पाठ की जाँच
सनातनशाला संपादकीय प्रक्रिया
अर्थ
सनातनशाला संपादकीय प्रक्रिया
अंतिम जाँच

परिवर्तन सूची

  • : प्रकाशित। पाठ स्वतंत्र स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया (संपादकीय नीति देखें)।

त्रुटि बताएं

इस पृष्ठ में कोई गलती मिली? बताएं क्या और कहाँ।