परमा एकादशी व्रत कथा · Parama Ekadashi Vrat Katha

गरीब ब्राह्मण सुमेधा और उनकी पतिव्रता पत्नी की कथा, जिनकी दरिद्रता ऋषि कौंडिन्य के बताए अधिक मास की परमा एकादशी के व्रत से दूर हुई, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।

कथा (हमारे शब्दों में)

श्रीकृष्ण ने कहा कि अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा कहते हैं, और इसकी कथा सुनाई।

काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम के एक धर्मात्मा ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ रहते थे। किसी पूर्व दोष के कारण वे घोर दरिद्रता में जी रहे थे। उनकी पत्नी निष्ठा से पति की सेवा करती, और अतिथि को भोजन कराकर स्वयं भूखी रह जाती थी।

एक दिन सुमेधा ने पत्नी से कहा कि धन के बिना गृहस्थी नहीं चलती, इसलिए उन्हें कमाने के लिए परदेश जाना होगा। पत्नी ने कहा कि पति जो कहे पत्नी को वही करना चाहिए, पर हर व्यक्ति को अपने पूर्व कर्मों का फल मिलता है और भाग्य का लिखा टलता नहीं; जो भाग्य में होगा, वह यहीं मिल जाएगा। इसलिए वे नहीं गए।

कुछ समय बाद ऋषि कौंडिन्य उनके घर आए। उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया, आसन और भोजन दिया, और पत्नी ने दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा। कौंडिन्य ऋषि ने बताया कि अधिक मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का व्रत सब पाप, दुख और दरिद्रता नष्ट करता है, और इसे करने वाला धनवान हो जाता है; रात भजन-कीर्तन के साथ जागरण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी व्रत से शिव जी ने कुबेर को धनाध्यक्ष बनाया, और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को पुत्र, पत्नी और राज्य फिर मिले।

ऋषि के बताए अनुसार ब्राह्मण और उनकी पत्नी ने पाँच दिन तक परमा एकादशी का व्रत किया। व्रत पूरा होने पर एक राजकुमार उनके पास आया और ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उन्हें एक सुंदर घर और आजीविका के लिए एक गाँव दिया। उनकी दरिद्रता दूर हो गई, और पृथ्वी पर अनेक वर्ष सुख भोगकर वे स्वर्ग गए।

यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।

इस पाठ के बारे में

परमा एकादशी अधिक (पुरुषोत्तम) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। इसकी कथा उस शृंखला का भाग है जिसमें हर एकादशी की महिमा बताई जाती है, प्रायः श्रीकृष्ण के पांडवों को दिए उत्तर के रूप में। यह केवल उन वर्षों में आती है जिनमें अधिक मास होता है, इसीलिए ऐसे वर्ष में 24 के बजाय 26 एकादशी होती हैं।

प्रकाशित रूप हिंदी गद्य में हैं और उनके शब्दों तथा कुछ नामों और विवरणों में अंतर है। ऊपर दी गई कथा में केवल वही बातें हैं जिन पर नीचे दिए गए कम से कम दो रूप सहमत हैं। इस वर्ष की तिथि के लिए एकादशी देखें।

पाठ कैसे किया जाता है

कथा परमा एकादशी के दिन विष्णु भगवान की पूजा के अंग के रूप में पढ़ी या सुनी जाती है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।

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स्रोत और जाँच

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