मोक्षदा एकादशी व्रत कथा · Mokshada Ekadashi Vrat Katha

राजा वैखानस की कथा, जिन्होंने मोक्षदा एकादशी के व्रत के पुण्य से अपने पिता को नरक से मुक्त कराया, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।

कथा (हमारे शब्दों में)

श्रीकृष्ण ने कहा कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा, यानी मोक्ष देने वाली, कहते हैं। चिंतामणि की तरह यह सब कामनाएँ पूरी करती है, और इसके द्वारा नरक में गिरे पितर भी स्वर्ग पा सकते हैं।

राजा वैखानस गोकुल नगर में राज्य करते थे, जहाँ वेदों के ज्ञाता अनेक ब्राह्मण रहते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि उनके पिता नरक में पड़े हैं और कह रहे हैं: "पुत्र, मुझे बचाओ।" बहुत व्याकुल होकर राजा ने ब्राह्मणों को स्वप्न सुनाया और पिता की मुक्ति का उपाय पूछा।

ब्राह्मणों ने बताया कि पास ही भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता पर्वत मुनि का आश्रम है। राजा वहाँ गए, मुनि के चरणों में गिरकर सब बताया। गहराई से विचार करके मुनि ने उन्हें मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का व्रत करने और उसका पुण्य पिता को देने को कहा।

राजा घर लौटे और दिन आने पर परिवार सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य पिता को अर्पित किया। उसके प्रभाव से पिता मुक्त हो गए। स्वर्ग जाते हुए उन्होंने पुत्र को आशीर्वाद दिया: "पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो।"

कथा के अंत में कहा गया है कि जो यह व्रत करता है, वह पापों से छूटकर मोक्ष पाता है।

यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।

इस पाठ के बारे में

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसकी कथा उस शृंखला का भाग है जिसमें हर एकादशी की महिमा बताई जाती है, प्रायः श्रीकृष्ण के पांडवों को दिए उत्तर के रूप में। इसी एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है।

प्रकाशित रूप हिंदी गद्य में हैं और उनके शब्दों तथा कुछ नामों और विवरणों में अंतर है। ऊपर दी गई कथा में केवल वही बातें हैं जिन पर नीचे दिए गए कम से कम दो रूप सहमत हैं। इस वर्ष की तिथि के लिए मोक्षदा एकादशी देखें।

पाठ कैसे किया जाता है

कथा मोक्षदा एकादशी के दिन विष्णु भगवान की पूजा के अंग के रूप में पढ़ी या सुनी जाती है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।

कब पढ़ा जाता है

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स्रोत और जाँच

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