संतोषी माता व्रत कथा · Santoshi Mata Vrat Katha

संतोषी माता की शुक्रवार व्रत कथा: एक उपेक्षित बहू जिसने शुक्रवार का व्रत किया, पति का लौटना, टूटा उद्यापन, और माता का घर आना, प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में।

कथा (हमारे शब्दों में)

सातवाँ बेटा

एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह कमाते थे; सातवाँ नहीं कमाता था, और वह उसे बाकी छह की थालियों में बचा जूठा खिलाती थी। पत्नी ने उसे यह बताया, पर उसने तब तक नहीं माना जब तक एक त्योहार पर सिरदर्द का बहाना करके रसोई में लेटकर उसने माँ को भाइयों की थालियों से लड्डू के टुकड़े बटोरकर उसका लड्डू बनाते न देख लिया। दुखी होकर वह उसी दिन परदेश चला गया, और निशानी के रूप में पत्नी को अपनी अंगूठी दे गया।

परदेश में उसने एक साहूकार के यहाँ नौकरी की, काम इतना अच्छा किया कि उसे साझेदार बना लिया गया, और कुछ वर्षों में वह स्वयं धनी सेठ बन गया। पर वह अपनी पत्नी को भूल गया।

व्रत

घर पर उसकी पत्नी से बुरा व्यवहार होता था। सास-ससुर उससे घर का सारा काम करवाते और जंगल से लकड़ी मँगवाते, और उसे भूसी की रोटी और फूटे नारियल के खोपड़े में पानी देते। एक दिन जंगल जाते हुए उसने स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा और उसके बारे में पूछा। उन्होंने बताया: अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुड़ और चना लो; हर शुक्रवार बिना क्रम तोड़े व्रत करो और कथा सुनो; मनोकामना पूरी होने पर उद्यापन करो और लड़कों को भोजन कराओ; और उस दिन घर में कोई खट्टा न खाए।

उसने लकड़ी का बोझ बेचा, गुड़-चना लिया, और संतोषी माता के मंदिर जाकर उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना की। जल्दी ही पति का पत्र आया, फिर पैसे। जेठ के लड़के उसे ताने देने लगे। रोते हुए उसने माता से कहा कि उसने कभी पैसा नहीं माँगा; वह तो केवल पति के दर्शन चाहती है। प्रसन्न होकर माता ने कहा कि उसका पति आएगा।

पति की वापसी

संतोषी माता ने पति को स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि उसकी पत्नी कष्ट में है। उसने कहा कि लेन-देन का हिसाब बाकी है, वह कैसे जाए। माता ने कहा कि सुबह नहाकर उनका नाम लो, घी का दीपक जलाओ, प्रणाम करो और दुकान पर बैठो। उस दिन सारा लेन-देन चुक गया, सारा माल बिक गया, और शाम तक धन का ढेर लग गया। उसने कपड़े-गहने खरीदे और घर की ओर चल पड़ा।

माता ने पत्नी को बताया कि उसका पति आ रहा है, और लकड़ी के तीन बोझ बनवाए: एक नदी किनारे, एक मंदिर पर, और एक सिर पर। सूखी लकड़ी देखकर पति घर जाने से पहले वहीं रुककर भोजन करने लगा। जब पत्नी बोझ लेकर घर आई, तो उसने पुकारा: "सासूजी, लकड़ी लो और मेरी भूसी की रोटी और नारियल के खोपड़े में पानी दो; आज कौन मेहमान आया है?" पति बाहर आया, उसके हाथ में अपनी अंगूठी देखकर पूछा कि यह कौन है। माँ ने उसकी बुराई की, पर वह सब देख चुका था; उसने दूसरा घर लिया और पत्नी के साथ सुख से रहने लगा।

टूटा उद्यापन

एक शुक्रवार पत्नी ने उद्यापन किया और जेठ के लड़कों को बुलाया। उनकी माँ ने उन्हें खटाई माँगना सिखा दिया। खाने के बाद वे खटाई और फिर पैसे माँगने लगे, और भोली बहू ने उन्हें पैसे दे दिए, जिनसे उन्होंने इमली खरीदी। माता रुष्ट हुईं: राजा के दूत पति को पकड़ ले गए, और ससुराल वाले कहने लगे कि उसने धन चुराया होगा। पत्नी रोती हुई मंदिर गई और भूल की क्षमा माँगी, फिर से उद्यापन करने का वचन दिया। माता ने कहा कि रास्ते में उसे पति मिलेगा, और ऐसा ही हुआ: उसे कमाए धन का कर भरने बुलाया गया था।

अगले उद्यापन में लड़कों ने फिर खटाई माँगी। इस बार उसने मना कर दिया और नियम का पालन किया, और माता प्रसन्न हुईं। नौवें महीने उसे चंद्रमा जैसा सुंदर पुत्र हुआ।

द्वार पर माता

पत्नी रोज़ पुत्र के साथ मंदिर जाती थी। एक दिन माता ने सोचा कि आज वे ही उसके घर जाएँ, और भयानक रूप में आईं, मुख पर गुड़-चना लगा था और मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। सास चिल्लाई कि कोई डायन आ गई, और लड़कों से उसे भगाने को कहा। पर बहू उन्हें देखकर खुशी से चिल्लाई कि आज उसकी माता उसके घर आई हैं। तब परिवार समझ गया कि ये संतोषी माता हैं, उनके चरणों में गिरे और व्रत भंग करने की क्षमा माँगी। माता ने उन्हें क्षमा कर दिया।

कथा के अंत में प्रार्थना है कि जैसे माता ने बहू को फल दिया, वैसा ही वे पढ़ने-सुनने वाले सबको दें।

यह कथा यहाँ केवल हमारे शब्दों में दी गई है: प्रकाशित रूप इसे अलग-अलग शब्दों और विवरणों के साथ कहते हैं, और इसका कोई मूल पाठ हमने नहीं मिलाया है। इसकी हर बात नीचे दिए गए कम से कम दो प्रकाशित रूपों में मिलती है।

इस पाठ के बारे में

यह संतोषी माता के शुक्रवार व्रत की कथा है, जो परंपरा से सोलह शुक्रवार रखा जाता है और उद्यापन से पूरा होता है। यह व्रत के नियम सिखाती है: गुड़-चने का भोग, लगातार शुक्रवार, और व्रत के दिन खटाई का निषेध। यह व्रत-पुस्तिकाओं में चलने वाली लोक-कथा है; प्रकाशित रूप थोड़े अंतर के साथ एक ही कथा कहते हैं। ऊपर दी गई कथा में केवल वही बातें हैं जिन पर नीचे दिए गए कम से कम दो रूप सहमत हैं।

पाठ कैसे किया जाता है

कथा शुक्रवार को संतोषी माता के व्रत में पढ़ी या सुनी जाती है, जिसके बाद संतोषी माता की आरती और गुड़-चने का प्रसाद होता है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होती हैं।

कब पढ़ा जाता है

और पढ़ें: संतोषी माता

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स्रोत और जाँच

तुलना किए गए संस्करण
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    पाठ की जाँच
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    • : प्रकाशित। इस पृष्ठ पर दिए गए प्रकाशित रूपों से हमारे शब्दों में लिखी कथा (संपादकीय नीति देखें)।

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