शिव लिंग पूजा का राज जुडा है उत्तरकाण्ड से

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शिव लिंग पूजा का राज जुडा है उत्तरकाण्ड से /
Shiva Ling worship is connected with Uttarakhand

प्रजापति दक्ष अपने दामाद शिव जी से ईर्ष्या रखते थे। एक बार उन्होंने शिव जी को नीचा दिखाने के लिए कनखल के समीप यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में उन्होंने देवर्षियों, महर्षियों और देवताओं को आमंत्रित किया, किंतु अपनी पुत्री सती और शिव जी की उपेक्षा की। इस यज्ञ में सर्व यज्ञों में पारंगत महर्षि दधीचि को भी सादर आमंत्रित किया गया था। महर्षि दधीचि ने शिव को अनुपस्थित देखकर दक्ष को समझाते हुए कहा, देवाधिदेव भगवान शंकर की कृपा के बिना कोई भी यज्ञ सफल नहीं हो सकता। राग-द्वेष की कुत्सित भावना से किया गया कोई भी सत्कर्म विनाश का कारण बनता है। इसलिए अब भी समय है, हठ त्यागकर भगवान महादेव को सादर आमंत्रित करें।

यह सुनते ही प्रजापति दक्ष शिव जी के प्रति कटु वचनों का प्रयोग करने लगे। वह उन्हें भूतों और पिशाचों का स्वामी कहने लगे। दक्ष के भय से वहां उपस्थित जनों में से किसी ने भी इसका प्रतिवाद नहीं किया, लेकिन महर्षि दधीचि निर्भीकता से बोले, शिव जी के प्रति अपशब्द सुनना मेरे लिए असहनीय है। मैं भविष्यवाणी करता हूं कि यह यज्ञ तुम्हारे कल्याण का नहीं, विनाश का कारण बनेगा। भगवान रुद्र की क्रोधाग्नि से सब कुछ ध्वस्त हो जाएगा। यह कहते-कहते महर्षि यज्ञ छोड़कर अपने आश्रम लौट आए।
शिव की अर्धांगिनी भगवती सती को जब यह पता चला कि पिता प्रजापति दक्ष ने कनखल के समीप यज्ञ का आयोजन किया हैं। भगवती सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं। घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहां मेरा अपमान कराने आई हो ? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघांबर हैं। वह तुम्हें बाघांबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं ? अब तो आ ही गई हूं। पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। और उस यज्ञमंडल में गईं जहां आहुतियां डाली जा रही थीं। और अपने पति के तिरस्कार को देखकर वो यज्ञ के हवन में कूद पड़ी और देह त्याग कर दिया।

शिव ने कैलाश में यह बात जान दक्ष प्रजापति का यज्ञ विध्वंश कर सबका नाश कर दिया। और भगवती सती की भस्म को आच्छादित कर झाकर सैम (अल्मोड़ा जिले में स्थिति) में तपस्या की। झाकर सैम को तब से देवदारु वन के आच्छादित बताया है। झाकर सैम जागीश्वर पर्वत में है।

इस पर्वत में सप्त ऋषि अपनी पत्नियों सहित रहते थे। एक दिन ऋषि की पत्नियों ने कुशा और समिधा एकत्र करते हुए, शिव को भस्म मले हुए नगनवस्था में तपस्या करते देखा। गले में साप की माला थी और आँखे बंद, मौन धारण किये हुए, चित उनका काली (पत्नी) के शोक में संतप्त था। ऋषि के स्त्रियाँ उनके सौंदर्य को देखकर उनके चारो और एकत्र हो गयी। सप्त ऋषियों  की सातो स्त्रियाँ जब रात में न लौटी तो प्रातः काल वे ढुंढने को गए। देखा.. तो शिव समाधि लिए है, और स्त्रियाँ उनके चारो और बेहोश पड़ी है। यह देख कर ऋषियों के मन में विचार आया की शिव ने उनकी स्त्रियों की बेजज्ती की है, शिव को शाप दिया “जिस इन्द्रय यानी जिस वस्तु से तुमने यह अनौचित्य किया है, वह लिंग भूमि में गिर जाय “।

तब शिव ने कहा ”

“तुमने मुझे आकरण शाप दिया है, लेकिन तुमने मुझे संकित अवस्था में पाया है, इसलिए मैं तुम्हारे शाप का विरोध नहीं करूँगा। मेरा लिंग धरती पर गिरेगा और तुम सातो सप्त ऋषि के रूप में आकाश में चमकोगे” अतः शिव ने शाप के अनुसार अपने लिंग को धरती में गिराया।

सारी धरती शिव के लिंग से ढक गयी। गन्धर्व देवताओ ने शिव की प्रार्थना की और उन्होंने लिंग का नाम यागीश या यागीश्वर कहा और वे सप्त्रिशी कहलाये।

यागीश इसलिए नाम पड़ा की स्त्रियाँ यज्ञ के लिए कुशा व समिधा एकत्र कर रही थी। महाभारत में ऋषियों के साथ रमण करने की कहानी को अग्नि का रूप दिया गया है, वहां शिव अग्नि रूप में आये है। स्वाहा उसमे से ऋषियों में पत्नी है। स्वाहा ने अग्नि को संतुष्ट किया, उसमे जो वीय (स्कन्न) निकला, वह स्वाहा ने एक स्वर्णघट में एकत्र किया, जिससे सकंद यानी स्वामी कार्तिकेय पैदा हुए। वह कार्तिकेय इसलिए कहलाये की वह कर्तिको (किरातो) द्वारा पाले गए, जो कैलाश में रहते थे। उनके छह सर वह १२ हाथ थे, पर पेट एक ही था।कारण यह था कि ७ स्त्रियों में से छह ने शिव के साथ सम्भोग किया था और ७ अरुदति, जो वशिष्ठ कि पत्नी थी, इस कृत्य में सम्मलित नहीं थी। इसी कारण कार्तिकेय षडानन कहलाये।

यागीश्वर (जागीश्वर) में पण्डे भी यही कहानी कहते है। वे इतनी बात और जोड़ते है कि महादेव सातो स्त्रियों पर मोह्हित थे। वे इनको नगन अवस्था में मिले थे। भोले नाथ पार्वती के लिए तम्बूरा व डमरू बजाकर निर्त्य कर रहे थे। शाप के कारण लिंग भूमि में गिरा और भूमि लिंग के बार से दबने लगी।

तब, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा व अन्य देवगण, जो जागीश्वर में शिव की सुतुती कर कर रहे थे आपने-२ अंश वे शक्ति छोड़कर चले गये !  प्रथ्वी लिंग के भार से दबने लगी, और शिव से प्रार्थना की वह भार से मुक्त की जाय, तब देवी देवताओ ने लिंग का आदि अंत जानना चाहा ! प्रथ्वी ने ब्रह्मा से पूछा “लिंग कहाँ तक है ”

ब्रह्मा जी ने कहा ” जहाँ तक प्रथ्वी है वहां तक”

प्रथ्वी ने ब्रह्मा को शाप दिया ” तुमने एक बड़े देवता होकर झूठ बोला, इससे संसार में तुमारी पूजा नहीं होगी!

ब्रह्मा ने भी प्रथ्वी को शाप दिया ” तुम भी कलयुग के अंत में ग्लेच्छो भर जावोगी!

देवी देवताओ ने प्रथ्वी से तो उन्होंने के कहा – ‘ जब ब्रह्मा, विष्णु व कपिल इस बात को नहीं जानते, तो वो कैसे जाने, !

तब भगवान् विष्णु से पूछा गया, ” वे पातळ गए, पर अंत ना पा सके! तब देवताओ ने विष्णु की प्रार्थना की ! विष्णु शिव के पास गए, और इनसे अनुनय विनय के बाद चक्र से लिंग को काटकर तमाम भारत के कोने-२ में बाटा, यागीश्वर (जागीश्वर) तब से पावित्र्य तीर्थ हो गया।

अतः जागेश्वर में लिंग काटा गया ! और वह नौ खंडो में बाटा गया !

(१)   हिमाद्री खंड
(२)   मानसखंड
(३)  केदारखंड
(४)  पातालखंड – जहाँ नागो के पूजा की जाती है
(५)  कैलाश खंड – जहाँ शिव स्वय विराजते है
(६)   काशीखण्ड (जहाँ विश्वनाथ है)
(७)  रेवाखंड (जहाँ रेवा नदी है, जिसके पत्थर नारव देश्वर के रूप में लिंग की पूजा होती है)
(८)  ब्रह्तोतर खंड (जहाँ गोकेश्वर महादेव है) – कनारा जिला मुंबई
(९)  नगरखंड जिसमे उज्जैन नगरी है

 

 

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