मरने से पहले रावण ने क्या शिक्षा दी

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रामायण का प्रत्येक किरदार हमें जीवन के किसी न किसी रहस्य से अवगत जरूर कराता है फिर चाहे वो मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम हो या फिर लंकापति रावण ही क्यों न हो।
रामायण के अनुसार व्यक्ति के द्वारा कृत कर्म ही उसके जीवन और मृत्यु का कारण बनती है। सृष्टि में जब किसी का जन्म होता है तो उसके विनाश का प्रावधान भी पहले से तय होता है।
अर्थात इस संसार में कोई भी अमर नही है उसका अंत निश्चित है फिर चाहे वो रावण के जैसा महाप्रतापी ही क्यों न हो।
अगर हम रावण के चरित्र की बात करतें है तो पातें है कि वह समस्त शास्त्रों का ज्ञाता था। उसने सैकड़ो तप और व्रत के द्वारा सभी देवताओं को प्रसन्न कर उनसे उच्चतम वरो की प्राप्ति की थी परंतु कहते हैं न विनाश काले विपरीत बुद्धि ।
अर्थात अपनी बहन की बातों में आकर माता सीता का हरण कर उसने अपनी ही मौत को न्योता दिया परंतु फिर भी मरतें समय रावण ने तीन ऐसी बातों का जिक्र किया जो जीवन के तीन परम सत्य है।

प्रथम–शुभ कार्यो को करने मे कभी विलंब नही करनी चाहिए। और मोहमया से वशीभूत होकर यदि कोई अधर्म का कार्य करना पड़बीजाये तो जितना हो सके उससे बचने का प्रयास करना चाहिए।

द्वितीय–अपनी शक्ति और पराक्रम पर कभी घमंड नही करना चाहिए और न ही कभी शत्रु को तुच्छ सम्झना चाहिए। मुझे परम देवता ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था की सिर्फ वानर और मानव को छोड़कर मुझे तीनों लोको मे कोई परास्त नही सकता परंतु अपनी शक्तियों के घमंड मे आकार मैं उन्हे तुच्छ और निम्न कोटि का समझता रहा जो की अंततः मेरे विनाश का कारण बना।

तृतीय–तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात…..“ऐसा कोई भी रहस्य जो की आपके जीवन या मृत्यु का कारण बन सकता हो उसे कभी किसी को नही बताना चाहिए फिर चाहे वो आपका भाई बंधु ही क्यू न हो। क्योंकि हितैषी कब शत्रु बन जाए यह जान पाना असंभव है।

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